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Sunday, September 14, 2025

कर्मफल और उम्मीद का आशियां (Karma Phal aur Umeed ka Ashiyaan)


जैसा किया है करम मैंने,
वैसा ही मिलेगा फल मुझे,
न रहे मुझमें बचकाना भरम,
चाहे कर लूं कोई भी तीरथ धरम!

यह था मेरा ही करम,
जो भुगत रही है वह हरदम,
फल है, है मेरी ही शरम,
है नींव जिंदगी की काफ़ी नरम!

बड़ा पाप किया था मैंने ही,
कि रुलाया था दोस्त को काफ़ी,
अब हमसफ़र की किस्मत फूटी जाय,
लगा रे जबर्दस्त दर्द की हाय!

प्यार को रौंधकर तुम
सुखी न होगे कभी,
जिस कदर दर्द दिया है तुमने,
तड़पाएंगे तुमको भी सभी!

हर दिन मेरे कानों में, सुन,
बजती रहती है यही धुन,
पहन इकतरफा आरोपों का माला,
बढ़ाता हूं मंगल का ही प्याला!

नसीब से मिलता है जीवन में,
साथी जो साथ जिए और साथ मरे,
खोया था उसे नासमझी ने,
दोष चढ़ा जिसपे वह क्या करे!

हां, गलती मुझसे हुई,
कि कर्ण न बन सका मैं,
अफ़सोस रगों में रोज बही,
कि एक और मौका न दे सका मैं!

किस्मत का खेल यह था,
कि दोराहे पर ला खड़ा किया था,
राह एक को ही चुनना था,
असहाय, कुछ कर न सका!

बददुआएं ही हैं, माफ़ी नहीं,
लेकिन फिर भी बदनसीब मैं नहीं,
क्योंकि सौ आंधी अंधेरों में भी
जिंदगी ने दिया एक जुगनू ही!

उसने खुदको मुझमें देकर
बना दिया है मुझको श्वेत,
अकेलापन ने अपनापन पाकर
सींचा उम्मीद के किस्सों की खेत!

अब खुद को न्योछावर करके मैं,
साफ करता अपने दिल का दर्पण,
शांत करूं मैं, शीतल करूं मैं,
हर दर्द को, कर अपना ही तर्पण!

दर्द ने आईना दिखाया है,
जीवन ने जीना सिखाया है,
अब उसमें मैं खुदको देकर,
न भटकूं और हर दर दर!

अक्षों से धो दूं वक्ष कमल,
तौलों मुझको हे नील धवल,
अब और न टालूं कहकर कल,
आज ही हो हर गुरूर का हल!

माटी का तन है मेरा,
हो माटी सा ही मन,
बार बार टूटे फिर बने,
हर कोई पाए ऐसा ही धन!

रंग दूं हर मन को नभ जैसा, 
ले अरुण ऊषा से मैं आशा,
अंगारों और ईंटों से बनाऊं
मैं दुआओं का आशियां!

-- भास्कर घोष 
रवि, 14 सितंबर 2025
सुबह 7 बजे, पटना

(आज हिंदी दिवस है)
(फोटो perplexity द्वारा बनाया गया है)

Wednesday, August 13, 2025

जिसके पास तुम हो (Jiske Paas Tum Ho)


जिसके पास तुम हो,
उसके पास ऊपर वाले का रहम है,
एक सच्चे दिल की कसम है,
और बिन मांगे मन्नत की रसम है!

जिसके पास तुम हो,
उसके पास खुदा का नूर है,
अपनापन का मिठास भरपूर है,
क्योंकि गुरूर उससे कोसों दूर है!

जिसके पास तुम हो,
उसके पास साथ चलने की चाह अपार है,
औ' दोस्ती व हिम्मत का भंडार है,
इसलिए तो खूब सारा प्यार है!

जिसके पास तुम हो,
उसके पास खुशनसीबी की दुआ है,
जलते अंगारों में भी उसे मलहम ने छुआ है,
तभी तो सच्चे प्यार का इज़हार हुआ है!

जिसके पास तुम हो,
उसे कभी न मिटने वाला वरदान है,
अनछुआ, खांटी सोने की खान है,
बड़ा ही अनमोल उसका जहान है!

-- भास्कर घोष 
मंगल, 12 अगस्त 2025
रात 11:58 बजे, पटना

(ऊपर दिया गया चित्र perplexity ऐप द्वारा बनाई गई है)

Tuesday, August 5, 2025

फिर से छूना है वो मुकाम Phir Se Chhuna Hai Wo Mukam



फिर से छूना है वो मुकाम,
जिसे छोड़ आए थे हम।

जिसका हो पूरा का पूरा मयखाना,
क्या अफसोस उसे चंद गिलासों का?

जिसने समंदर में खाया हो गोता,
नहीं डरता कतई वह चुल्लुओं से!

और जो मर कर के लौटा हो वापस,
कैसे घबराए अब वह जिंदगी से?

काफ़ी देर ठहर चुका तंग स्टेशन पे,
अब फिर से चलने की मैंने ठानी है!

ठेस वाली जिंदगी अब खुद को कोसती है,
हरकतों की भी एक हद होती है!

अब बहुत हो चुका है सिरदर्द मेरा,
भनभनाते उल्लुओं से अब ऊपर उड़ना है!

गवारों की गलियों में
अब और नहीं मुझको रहना है!

पैसे से तालीम, और पद से कद मापने वालों को
उन्हीं की भाषा में जवाब-ए-जबरदस्त देना है!

ठीक है कि फिर लहरों से लड़ना होगा,
लेकिन समंदर तो अपना होगा!

सुकून और सेवा के लिए छोड़ा था आसमां,
लेकिन अब टूट चुका है भ्रम का समां!

चीलों व चमगादड़ों से इतना बड़ा है होना,
कि कभी सपने में भी ये छू न सके सीना!

सो, अब न चाहूं मैं नींद चैन की,
अब न करूं मैं बातें न्याय की।

जब तक लांघू न वो मुकाम,
जिसे छोड़ आए थे हम।

-- भास्कर घोष
मंगल, 5 अगस्त 2025
शाम 7:10 बजे, पटना

(फोटो का आभार: गूगल जेमिनी)

Saturday, August 2, 2025

ज़िंदगी के किस्से Jindagi Ke Kisse

लोग सोचते हैं 
कि यह चीज़ मेरी है,
मैं इसका मालिक हूं।

पर असल में,
यह एक खेल है
जो दिमाग में चलता है।

क्योंकि हम ख़ुद को
जिस चीज़ का मालिक मान बैठते हैं,
एक दिन वही हमारा मालिक बन जाता है।

कब तख्ता पलट की घड़ी आ जाती है,
हमें पता ही नहीं चलता,
देखते देखते हम गुलाम हो जाते हैं।

यह मालिक-गुलाम वाला खेल
एक सिनेमा की तरह है,
लगता है कि है, पर सच नहीं!

जैसे हम सिनेमा के दृश्यों पे 
हंसते हैं, रोते हैं, डर जाते हैं,
वैसे ही ज़िंदगी के किस्से होते हैं।

हम कहानियों पे भावुक हो सकते हैं,
पर उन्हें सच व ठोस मान बैठना
बेवकूफी नहीं तो और क्या है?

पैदाइश और परवरिश, 
दोनों में फर्क है -
एक हो चुका, दूसरा अभी भी जारी है।

इसीलिए तो यह एक मौका है -
खुद को जानने का,
सच को पहचानने का।

ख़ुद को खोजने का
सफ़र है यह जिंदगी,
काबू करने का कोई जंग नहीं!

-- भास्कर घोष
शनिवार, 2 अगस्त 2025
सुबह 9:55 बजे, पटना

(फोटो के लिए आभार: https://en.m.wikipedia.org/wiki/35_mm_movie_film)

Monday, June 16, 2025

अब और नहीं तुझे सोना है Ab Aur Nahi Tujhe Sona Hai



दोनों बाहें ऊंची करके
बोलो, आगे आना है।
चारों दिशाएं अब जाग चुकीं हैं,
अब और नहीं तुझे सोना है!

बहुत छिप लिए अंधेरे में,
डर का वज़न अब न ढोना है।
बहुत हार चुके जीवन में,
अब आगे नहीं और रोना है!

बहुत मरते ही रहे तेरे सपनों ने,
न और सहो गुमनामी का चोगा।
बहुत मर चुके हो तुम जग में,
लेकिन अब आगे जीना होगा!

जीवन के पग चिन्हों पे
जो दिया जलाई जाएगी,
वो सुनो तुम्हारे हिम्मत की
मिट्टी से बनाई जाएगी!

घेरों और अंधेरों ने खूब
किया तुम पर अपना राज है,
अब सीमाओं को मिटाने की
घड़ी का तेरा आग़ाज़ है।

आंधी तूफानों में तू डटकर,
हजारों सितारें करे चित्कार,
हिम्मत का ही तू हक कर,
बस जीवन का हो आज हुंकार!

हमराही के हथेली पे तूने
मोहब्बत का नाम लिखवाया है।
अब डर नहीं है तेरे सीने में,
तूने खुद को सोने का सेहरा पहनाया है।

सुलगती आग की चिंगारी हो,
तूने अब अपनी किस्मत पहचाना है,
मिटती लौ तू आज जाग चुकी है,
अब आशा का आशियाना आजमाना है।

सो, उठ बैठ तू कर मंथन,
धरती पे खुद को पहचान,
तुझे लिखने वालों को भी तू
मौजूद रह, कर दे हैरान!

- भास्कर
सोमवार, 16 जून 2025
सुबह 9:30 बजे, पटना

(फोटो chatgpt द्वारा बनाई गई है)

Friday, March 21, 2025

साहिल से समंदर तक (Sahil se Samandar tak)

तू ज़िंदा है
तो क्या गम है?
क्या ये कम है -
जो तेरी आंखें नम है?

सीने में सांस है,
तभी तो आस है।
तमन्ना से विश्वास तक,
जीने का जोर तेरे पास है!

जब तक है सीने में
धड़कनों की आवाज़,
तब तक होते रहे तेरी
कोशिशों की आगाज़!

जरूरत से ही हुआ
हमेशा हर एक आविष्कार,
जद्दोजहत से ही है खुला
हमेशा क़िस्मत का द्वार।

जो जोख़िम न उठाए तू -
जोते माटी का कण कण,
तो हो कैसे बलशाली
तेरा जीवन तन मन?

हर पल तेरे पास है बोल,
समंदर का क्या लगाऊं मोल?
किनारे की कश्ती को ज़रूरत नहीं,
तू तो बूंद है, सागर ही तेरा घर है!

तैरने के लिए ही तू थी बनी,
आज कैसे क्यूं भूल गयी?
लहरों पे चलना ही तो थी
अफसाना नहीं, फ़ितरत तेरी!

तो उठ आज बुलंदी से
हो जा खड़ी, तू हो जा खड़ी।
बेख़ौफ़ तेरे बवंडरों से,
जूझने की अब आयी घड़ी!

तू नहीं है अबला,
हवाओं में उड़ा दे डर,
साहिल से समंदर का
तू आज रुख़ कर!

-- भास्कर घोष
शुक्रवार, 21 मार्च 2025
दोपहर 3:33, पटना

#PoetryDay



(image source: https://www.fizdi.com/beach-ocean-waves-prt_7809_66959-canvas-art-print-30in-x-24in)



Sunday, August 18, 2024

मुक्ति दीजिए प्रभु Mukti Dijiye Prabhu


हे आनंददाता,
बंधनमुक्त कीजिए प्रभु!
हे भाग्यविधाता,
मुक्ति दीजिए प्रभु!

जब आप हैं स्वयं
सत चित आनंद,
तब क्यों यह रहे
असत, बेहोश, निरानंद?

हे सत्यस्वरूप,
मिथ्या भंजन कीजिए प्रभु,
हे मायामुक्तरूप,
शाश्वत सत्य में लाइए प्रभु!

जो है मिथक,
उसे कब तक ढोए यह?
जो है नेत्र छानी,
उसे कब तक संवारे यह?

हे चिदात्मरूप,
मनभ्रम कीजिए खंडन प्रभु,
हे अंतरात्मा, अंतर्यामी,
चैतन्य का स्पर्श दीजिए प्रभु!

~ नयन,
रवि, 18 अगस्त 2024
दोपहर 1 बजे, पटना

Sunday, August 11, 2024

संभव नहीं Somethings are not possible



कुछ कर्मों का
प्रायश्चित संभव नहीं,
बस पश्चाताप ही है शेष!

कुछ लतों का
त्याग संभव नहीं,
बस तड़प ही है शेष!

कुछ गलतियों का
सुधार संभव नहीं,
बस दंड ही है शेष!

कुछ रोगों का
निरामय संभव नहीं,
बस भुगतना ही है शेष!

कुछ दुखों का
अंत संभव नहीं,
बस दर्द ही है शेष!

-- नयन
रवि, 11 अगस्त 2024
सुबह 9:30, आसनसोल

Thursday, July 25, 2024

चुल्लू भर पानी की खोज - Stupid search for a puddle


क्या समंदर छोड़ मैं चला
करने चुल्लू भर पानी की खोज?
सोचा था क्यों मुरख मन ने
कि संभलेगा नहीं यह बोझ?

ओस की बूंद व तितली की
स्थिरता को ही क्या चाहा था मैंने?
पर अकल बेच आस्था गँवाकर
क्यों किया था धैर्य से किनारा?

घट घट भटकता मैं चला
लेकरके क्यों फूटा लोटा?
गागर में सागर सिमटने को
क्या बह निकलेगा सारा जल?

कुछ पाने की जद्दोजहद ने क्या
काफ़ी कुछ न होने था दिया?
तो चीखने चिल्लाने व रोने के बजाय
क्यों बेजुबान अब बैठा है आंखें मूंद?

मुस्कान ने क्यों खोया मधुर को?
धैर्य को न मिला क्या साहस का सहारा?
प्यासी अधरें क्या थीं इतनी अंधी?
न दिखा, बारिश से लहरों का उफान?

नयन
25 जुलाई 2024
दोपहर 11:43, पटना

Thursday, March 7, 2024

जाने अंजाने में – Knowingly and Unknowingly


जाने अंजाने में

बहुत से जीवन को

चोट पहुंचाता हूं,

इसीलिए माफ़ी मांगता हूं मैं।


जाने अंजाने में

बहुत से प्राणी

मेरे जीवन को समृद्ध करते हैं,

इसीलिए शीष झुकाता हूं मैं।


जाने अंजाने में

कितने ही क्षण

जीवन की सीख दे जाते हैं,

इसीलिए (ख़ुद को) धन्य मानता हूं मैं।


जाने अंजाने में

सुख, दुख, हंसना व

रोने के बीच डोलता रहता हूं,

इसीलिए मां तुझे याद करता हूं मैं।


जाने अंजाने में

सूखे तपते अधरों में प्यार–परवाह की

शीतल बूंदों की आस लिए बैठता हूं,

इसीलिए दुआ मांगता हूं मैं।


जाने अंजाने में

मटमैले पानी में साफ समझ की

धारा का स्पर्श पाता हूं,

इसीलिए नमन करता हूं मैं।


जाने अंजाने में

तेरे रहम के कलम की

लिखाई को पढ़ पाता हूं,

इसीलिए फिक्र को त्याग पाता हूं मैं।


जाने अंजाने में

अनंत अस्तित्व की झलक में

अपना स्थान समझ पाता हूं,

इसीलिए ख़ुद को अर्पण करता हूं मैं।


– नयन

दोपहर 11:40,

बृहस्पतिवार, 7 मार्च 2024

पटना

Thursday, July 20, 2023

होश, आज़ादी और कोशिशें - Of Strifes And Strivings


आज़ाद हूं आज भी शायद
दर्द की ज़ुबान को सुनने को,
पर ख़ुद को मैं पाक रखूं,
इसी चाहत को लेकर चला हूं।

करने को वे करेंगे बहुत कुछ,
कहने को वे कहेंगे बहुत कुछ,
पर बेदाग रहूं भीतर से मैं,
इसी कोशिश के साथ खड़ा हूं।

होश में रहूं, सचेत रहूं,
पल पल धड़कनों को और 
सांसों को जानू, ताकि
मुख से निकले कुछ न बासी।

सीमित सोच व बीमार बुद्धि
से कैसे हो अब समाज की शुद्धि?
मन के हैवान को बदल, ताकि
भूल से भी न होएं उसकी दासी।

- नयन,
रात 11:22 बजे, 20 जुलाई 2023
पटना

Friday, June 30, 2023

आज़ादी की प्रतीक्षा - The Wait for Freedom


प्रतीक्षा यही आज़ाद होने का ही है,
वरना जाना तो सबको है एकदिन;
किसको किसमें कितना है होड़ –
यही कतार की शकल तय करता है।

ख्वाइशें तो मन में सबकी है,
कोई सक्षम है छुपाने में, कोई नहीं;
नकाब की आड़ में छिपे चेहरे,
बड़े हमशक्ल नज़र आते हैं।

सबको अपनी धुन में नचाता है कौन –
तक़दीर की लकीरें, या हालात के नुमाइंदे?
यह कैसा उधेड़बुन, कैसी बेसुध है बुद्धि?
जागेगा कैसे अंदरमहल का राजा?

हर वक्त कुछ पाने की ललक, हर वक्त
कुछ खोने के डर से अलग है क्या?
इतनी क्यों बेचैन हैं यह मासूम चितवन –
कि सांस लेने से भी जी घबराता है?

जिंदगी से ऊबकर जाना चाहो,
या दुनिया के कायदों से तंग हो,
या ख्वाइशों के पन्ने पूरे होने पर,
पर जाने को जलन है क्या सच में?

पहले आप या पहले मैं –
फासला बस इतना सा ही है,
कि किसका नंबर कब आएगा;
वरना कतार में तो सब खड़े हैं।

तो कैसे निकले पिंजरे से चिड़ी –
बिना बिके सौदागर के तराजु पे?
क्या पाए, कहां जाए, या क्या करे –
सोच, रवैया, या एक बड़ा सा दिल?

– नयन
शुक्र, १० जून, २०२३
रात १० बजे

Thursday, June 9, 2022

सच्चा स्वरूप - True Self


धीरे धीरे खेल की
गति धीमी होगी,
स्मृति धूमिल होगी, और
पहचान मिटती जायेगी,
जो दुनिया रचाया था
हमने सर में, खुदबखुद
समय उसे भुला देगा।

अपने अस्तित्व का वर्चस्व -
कुछ करने का नशा, वह
घमंड की बुलंदी हमारी -
काल कमज़ोर कर देगा
भुजाओं की ताकत हमारी।
भ्रम के हौसलें टूटेंगे, और
वह मुट्ठी भी खुल जायेगी।

अगर आज अगणित
झोंकों के नोकझोंक से
इतनी सी अकल आ जाए -
कि सृष्टि के सजाए इस
सपने में, खुश होते
तड़पते हम नहीं, कोई और है,
करते हम नहीं, कोई और है...

तो अंत में जब मिटेगी माया,
और सच की सूरत दिखलेगा,
तब यह गिला, यह अफसोस,
कुछ खोने की मायूसी,
यह झांसा न रहेगा मन में,
अपने सच्चे स्वरूप की शकल को
हम दिल से मान पाएंगे।

-- नयन,
बृहस्पतिवार, 9 जून, 2022
पटना

(Image Courtesy: https://www.consciouslifestylemag.com/true-self-finding-your-spiritual )

Wednesday, June 8, 2022

सृजन की लीला - Srijan ki Lila - Play of Creation


पुराने मरते शरीरों से
नया इंसान जनम लेगा।
पुरानी सृष्टि की कब्र पे ही
नया जंगल खड़ा होगा।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

मुरझाए सूखे फूलों से
नई कलियां खिल आएंगी।
पेड़ों की पुरानी शाखों में ही
नई टहनियां निकलेंगी।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुराने सड़ते पत्तों से
नये पौधें शकल लेंगे।
कीटों के अवशेषों से ही
नये केचुएं पैदा होंगे।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुराने टूटे बस्तियों से
नया शहर खड़ा होगा।
पुराना किला जहां आज है,
वहां कल नया घर होगा।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुराने भूले भटकों को
नई राह दिखलेगा।
हुए गुमराह जो आज हैं,
उन्हें भी अकल आयेगा।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुराने दिल के अफसोसों में
नये उमंग आ जायेंगे।
तड़पते हुए बेजुबानों में भी
नये सुर धुन लेंगे।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुराने दुखों की छाया से
नई खुशियां पनपेंगी।
पुराने बिलखते लोगों में ही
नई आशा भी आयेगी।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

पुरानी मिटती मानवता से
नया मानव उभरेगा।
पुराना समाज जाने पर ही
नया नियम चालू होगा।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

जहां जनम आज, कल मरण होगा,
खुशियां जहां, वहां कल दुख होगा,
विपरीत भी बिलकुल इसका सही है
बदलाव जीवन का ही ढंग है।

डर और मातम के अंधेर से
कल सुख-चैन की भी सुबह होगी।
और बंजर मरती मिट्टी में हम,
फूंक देंगे जीवन हरियाली।

यह मौत नहीं है जीवन है,
नित्य सृजन की लीला है।

-- नयन
बुधवार, 8 जून, 2022
पटना

(Image Courtesy: https://www.azocleantech.com/amp/article.aspx?ArticleID=1007 )

Wednesday, March 17, 2021

सत् Sat

सतनाम, सत्संग, सदगुरु।
सन्मति, सदगती, सन्मार्ग।
सदभाव, सद्दृष्टी, सत्कर्म।
सद्विचार, सदाचार, सद्व्यवहार।


Sat is a Sanskrit word meaning "the true essence" and "which is unchangeable" of an entity, species or existence. Sat is a common prefix in ancient Indian literature and variously implies that which is good, true, virtuous, being, happening, real, existing, enduring, lasting, essential. Wikipedia

Wednesday, November 25, 2020

बेशक्ल Beshakl (Faceless)

जहां भी गई मैं
लोगों की दुआओं ने मुझे
मेरी सूरत से ही दूर कर दिया।
शक्ल देखी है अपनी?
चले आते हैं कहां कहां से!
लोगों का मेरे दागों के प्रति लगाव ने
मुझे मेरी सूरत से ही भुला दिया,
मुझे तो बदसूरती ने बेशक्ल बना दिया!

...

लेकिन तुम!
जो अपनी खूबसूरती की तस्वीर
एक अमानत की तरह लिए फिरती थी,
तुम्हें क्या हुआ?
आज क्यूं अफसोसों का छाप
दिल पे लिए बैठी हो?
सुन्दर सूरत की फ्रेम में फंस कर 
बस रह गई क्या?

-- नयन
कोयंबटूर
२०१९

(चित्र यहां से गृहित है - https://www.pikrepo.com/ftkdp/silhouette-photo-of-long-haired-person)

परिवर्तन का खेल Parivartan ka khel


यह दुनिया भी उतनी पत्थर नहीं,
जितनी शायद दिखती है,
मन की आंखों से देखने पर
यह भी बदल सकती है।

समय बदल रहा है,
लोग बदल रहे हैं,
परिस्थितियां बदल रहीं हैं,
भला ही है, परिवर्तन हो रहा है।

यही तो प्रमाण है
कि यहां सबकुछ उतना हार मांस का नहीं!
यह दोष हमारे नज़र का ही तो है
कि हम सारे गुणों को ठोस मान बैठे!

समय के इस दरिया में
बुलबुले उभर कर आते हैं,
पर असीम करुणा की गोद में
क्षणिक सुख के बाद, समा भी तो जाते हैं।

कोई यहां कुछ बांध कर लाया नहीं,
कोई यहां साकार तो आया नहीं,
यूं ही लेन देन की रीत में
रंगों का खेल चला जा रहा है।

जो कल था, वह आज कहां?
आज का, कल रहेगा ही - यह भी अटल नहीं!
तो जिसके लिए जनम मरण की कसमें खाते हो,
कल बदल गया तो किसको मुंह दिखाओगे?

समय के चक्के पर घिसे जा रहे हो,
यही सोच कि अडिग हो, अच्छे हो, सही हो, सच्चे हो!
जिस दिन इस कफ़न का भार उतार दिया,
उसी वक्त आज़ाद हो जाओगे!

तजुर्बे के आगे उसूलों की क्या औकात!
पर सही गलत के तराज़ू में हमने
जीवन का जीना हराम कर दिया है!
इसीलिए तो खूब ही कहा है किसी ने - 

इस धरती पर आया जो है,
ढूंढा उसने उसको कब है!
बेहती गंगा को भुलाकर,
चुल्लू में खोजा कल है!

-- नयन
बुधवार, २५ नवंबर २०२०,
सुबह ४ बजे,
पटना

(चित्र यहां से गृहित है - https://commons.m.wikimedia.org/wiki/File:Waterfall_in_plitvicka_romanceor_5.jpg)

Wednesday, October 21, 2020

आखिरी चाहत Aakhiri Chahat (Last Wish)


ऐ खुदा
यह मुझको बता,
क्या किया था मैंने
कि यह वरदान
तूने मुझको दिया,
कि यहां आ गए हम,
कि यहां आ गए हम!

अब जियें या मरें,
है बस यही अरमान,
कि जियूं तो उसके लिए,
मरूं तो उसके लिए,
ये जान न्योछावर हो
बस अब उसी के लिए!
जिसने सांस लेना सिखलाया,
हर एक सांस अब 
बस उसी के लिए!

संसार की दौलत से परे
जिसने रूह का ख़ज़ाना खुलवाया,
बेबसी और तानों से निकाल कर
जिसने आज़ादी का सपना दिखलाया,
बंद आंखों में भी जिसने
ख़ुदा का नूर छलकाया,
अब और ये न खता हो,
कि उसे छोड़ जाऊं मैं!
कि उसे छोड़ कभी न जाऊं मैं!

जिसने खुद के पहचान से परे
खुद की कीमत समझाया,
जिसने अपनापन के रिश्तों से बढ़कर
खुद में जो ख़ुदा है,
उससे नाता जुड़वाया,
जिसने अपनी ही गहराइयों में छिपे
खुशी और रौशनी का रास्ता दिखलाया,
अब यहां यह धड़कता जीवन भी
बस उसी का नज़राना!

मेरे मालिक, मेरे मौला,
तूने इसको भी खींच लिया,
इस बेवकूफ अभागे को
भी तूने तिलिस्म दिखा दिया!
अब बस बाकी एक और चाहत है,
कि मुझे तू अपने में समा लेना,
फिर वापस जाने न देना,
बस अपने में समा लेना!

-- नयन
बुधवार, २१ अक्टूबर २०२०
कोयंबतूर


Thursday, September 24, 2020

दो नन्ही सी जान Do Nanhi Si Jaan

दो नन्ही सी जान!
कहां है, खुद वो कौन है,
क्यूं ही आयी, लाया भी कौन है,
इन सबसे अनजान!
पता नहीं क्यूं
छोड़ कर चली गई थी
उन्हें उनकी मां!
दो नन्ही सी जान।

एक नन्ही चीरी
चली गई छोड़
बहुत ही जल्द,
एक रात भी
न रुक पाई थी वह!
बेजाबान, आंखें मूंद
ही चली गई छोड़!

उसकी हमउम्र जुड़वा
रह गई थी अकेली,
मुंह फाड़, अंधेरे में,
अपनी नाज़ुक जीवन का
सहारा ढूंढ़ रही थी,
मां की ममता की 
आस में थी वह!

बेबस, नासमझ, हमने
नन्ही सी चीरी को
दिया एक बनाकर घोंसला,
पर दुविधा में जो भी थोड़ा
दिया उसे खाने को,
वो उसे ले न सकी!

कमजोर शरीर में
नाज़ुक सी सांस
शांत हुई जा रही थी,
धड़कनें शिथिल पड़ रहीं थीं,
चहचहाना बंद हो गया था,
खाने की हिम्मत न थी अब,
वह बहुत चुप हो गई थी!

सुबह के सूरज की
पहली लाली ने
दिल पे पत्थर रख दिया!
आंखों से टपकती आसुओं 
को पता चल चुका था,
मां के बिना नया जीवन
नहीं पनप सकता!
नन्ही सी जान की
एक दिन की जिन्दगी
हमसे अलविदा कह चुका था!

-- नयन
बृहस्पतिवार, २४ सितंबर २०२०
कोयंबतूर

(नितेश जी के मुख से सुनी ये एक सत्य घटना पे लिखी)

Sunday, September 13, 2020

आज़ाद परिंदा Aazaad Parinda



जिंदगी में कभी तो भैया
सच बोल दे, झूठा ही सही।
मौत आने के आगे कभी तो तू
प्यार उड़ेल दे, झूठा ही सही।

सच की गठरी तूने ली तो सही,
पर छेद थे कितने, देखा नहीं!
खाने को खोला तो पाया खाली,
बेहोश नयनों को दिखे न लाली!

दिखावे की हंसी, दिखावे का प्यार,
झेल न पावे समय की मार!
कभी तो भैया लगा अकल,
और मुखौटा उतार के चल!

बहुत बोझा डाला रे सर पे,
काम न आवे ये बेवक्त का ज्ञान!
काहे न देखे तू रे खुद को,
कैसे खड़ी है झूठी पहचान!

जिया नहीं जी भर कर जब तू,
किस बात का है ये काला धन?
समय चूक पछताने से पहले,
दे दे "खुल जा सिम सिम" की जबान!

जो है जमा, उसे पिघल जाने दे,
जो है अटका, निकल जाने दे,
खुली हवा में सांस लेकर,
आज़ाद परिंदा तू भी बन जा!

-- नयन
सोमवार, ७ सितंबर, २०२०
कोयंबतूर