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Tuesday, August 12, 2025

সাদা-কালো Sada-Kalo (Black and White)


সাদা দৃষ্টি-পটে দেখা পাই,
একটি কুচকুচে কালো পাখি,
আর কালো প্রেক্ষাপটে ভাসি,
পায়রা সাদা মেলে আঁখি।

জোনাকিরা দেয় আলো,
দেখতে যদি লাগে ভালো,
তখন কি আর লাগে হাহাকার,
রাতের নিস্তব্ধ অন্ধকার?

রোদের ধাঁধানো আলোতে,
যখন মাথা ফেটে যায় ব্যথায়,
তখন কি চায় না শরীর,
একটু ছায়া, একটুকু অন্ধকার?

আর সাড়া শব্দ শূন্য পথে,
এক নিবিড় নিশীথ রাতে,
দুরুদুরু বুক চায় না কি তখন,
জোছনা, চাঁদের আলোর মতন?

মাটিতে তৃষ্ণার্ত অবসাদ
দেখেছে আকাশে আজ,
আসে যেন এক ডানা মেলা
স্বপ্নের ফেরিওয়ালা!

সাদা-কালো তাই মাখা,
জীবনেতে আছে গাঁথা,
মুচকি হাঁসি ও অশ্রু ফোঁটা,
সঙ্গে নিয়ে সিনেমা গোটা!

আবছা আলো, সঘন বাতাস,
মনের মিঠাস, হৃদয়ের হাহুতাশ,
রঙিন তাই চীনেমাটির কাপ-প্লেট,
নিয়ে চলেছে ছায়াছবির সেট!

-- ভাস্কর ঘোস
মঙ্গল, 12 আগস্ট 2025
দুপুর 1:30, পাটনা

Saturday, August 2, 2025

ज़िंदगी के किस्से Jindagi Ke Kisse

लोग सोचते हैं 
कि यह चीज़ मेरी है,
मैं इसका मालिक हूं।

पर असल में,
यह एक खेल है
जो दिमाग में चलता है।

क्योंकि हम ख़ुद को
जिस चीज़ का मालिक मान बैठते हैं,
एक दिन वही हमारा मालिक बन जाता है।

कब तख्ता पलट की घड़ी आ जाती है,
हमें पता ही नहीं चलता,
देखते देखते हम गुलाम हो जाते हैं।

यह मालिक-गुलाम वाला खेल
एक सिनेमा की तरह है,
लगता है कि है, पर सच नहीं!

जैसे हम सिनेमा के दृश्यों पे 
हंसते हैं, रोते हैं, डर जाते हैं,
वैसे ही ज़िंदगी के किस्से होते हैं।

हम कहानियों पे भावुक हो सकते हैं,
पर उन्हें सच व ठोस मान बैठना
बेवकूफी नहीं तो और क्या है?

पैदाइश और परवरिश, 
दोनों में फर्क है -
एक हो चुका, दूसरा अभी भी जारी है।

इसीलिए तो यह एक मौका है -
खुद को जानने का,
सच को पहचानने का।

ख़ुद को खोजने का
सफ़र है यह जिंदगी,
काबू करने का कोई जंग नहीं!

-- भास्कर घोष
शनिवार, 2 अगस्त 2025
सुबह 9:55 बजे, पटना

(फोटो के लिए आभार: https://en.m.wikipedia.org/wiki/35_mm_movie_film)