Let the pages of this diary take you through the deep and beautiful corridors of the Musical Poet's heart, mind and beyond...
Thursday, June 9, 2022
सच्चा स्वरूप - True Self
Wednesday, June 8, 2022
सृजन की लीला - Srijan ki Lila - Play of Creation
Wednesday, November 25, 2020
बेशक्ल Beshakl (Faceless)
परिवर्तन का खेल Parivartan ka khel
Thursday, September 24, 2020
दो नन्ही सी जान Do Nanhi Si Jaan
Sunday, September 13, 2020
आज़ाद परिंदा Aazaad Parinda
Friday, May 8, 2020
बहता जीवन! Behta Jeevan
Monday, December 23, 2019
Dekhne ki gunzaish nahi hai - देखने की गुंजाइश नहीं है!
Sunday, September 8, 2019
क्या देख रहा हूं मैं! What am I witnessing! #CauveryCalling
मूसलाधार गिरती है बारिश,
हवाएं तेज हैं बह रहीं,
भीग उसमे चलता जाता
हौसलों से बुलंद एक दल,
और आगे चलता एक इंसान!
क्या देख रहा हूं मैं!
नदी बहे, देश न लड़े,
खुशहाल हो जन - जन,
किसान का जीवन हो आसान।
रुक न सकते, हो रही है देर -
कहते हैं वो, फिर निकल पड़ते!
क्या देख रहा हूं मैं!
एक दिन का प्यार नहीं,
ये बारह साल का संकल्प है!
लगे रहो, मेरे साथ रहो -
लोगों को, सरकारों को
वो याद बार - बार दिलाते हैं !
क्या देख रहा हूं मैं!
गोद में जिसकी खेला था मैं,
बड़ा हुआ जिसकी आंचल में,
तड़प रही वो हम से ही आज!
देखो - देखो वो मर रही!
पुकार रही है कावेरी मैया,
दिल है हममें सुनने को?
ये और विकल्प नहीं,
आन पड़ी जरूरत है अब।
आने वाली पीढ़ियों को
कैसा जीवन देंगे हम -
हल का हिस्सा बनने को वो कहते!
क्या देख रहा हूं मैं!
कावेरी मां को देंगे नई जान
लगाता हूं दाव पे शेष जीवन!
मांगे वो हमारा जीवन कर्म!
बच्चे, बूढ़े और जवान -
जुड़ते जाते उनकी पुकार पे!
क्या देख रहा हूं मैं!
नयन,
८ सितम्बर २०१९
सुबह ६:१०
बेंगलुरु
मैं एक नदी को कैसे बचा सकता हूं ?
बच्चे, बूढ़े और जवान आगे आ रहे हैं...
आप किसका इंतज़ार कर रहे है?
कावेरी को बचाने के लिए साथ आइए
इस लिंक पर स्वयं का अभियान शुरू कीजिए।
cauverycalling.org
Visit cauverycalling.org and support the planting of trees.
Either Donate trees or Become a Fundraiser and reach out to your friends and family for Saving Cauvery river!
Friday, June 14, 2019
sach me tap gayi hai dharti
सच में, तप गई है धरती
सुलगती हवा सीने को चीड़
उठती है ऊपर, आग सा गरम।
झुलसती चेहरे की सुखीं पलकें भी
जैसे बचा न पाती हैं आंखों को।
गिने चुने पेड़ों की मुरझाईं पत्तियां भी
हरियाली से बेआब्रू मिट्टी को
सुकून नहीं दे पाती है, आज
कहीं दिखती नहीं बारिश की आस -
सच में, तप गई है धरती।
जो बोल पातें हैं हम, फिर भी
कराहती आहों की आवाज़
नहीं पहुंच पाती है हमारी
सोती अंतरात्मा तक,
बीच में ही कहीं सुख कर
रह जाती है, उन अगनित
नदियों की तरह, जो आज
रेतीली राह बन रह गईं है सिर्फ,
पानी की परछाई से भी दूर।
फिर बेबाक जीवों की कहानी
क्या बयां करें? हम अपनी ही
नहीं सुनते, उनकी क्या सुनेंगे भला?
जीवन तो जीवन है बस, हो
चाहे इंसान, पशु, पक्षी या पेड़,
पर हमारी सिर्फ और पाने की
होड़ ने आज उजाड़ दिया है चमन,
हर एक जान, एक एक बूंद जीवन
के लिए हो गई है मोहताज।
आज अलकतरे की सड़कों से,
गिट्टियों से, सीमेंट-इमारतों से,
ज्वालामुखी के अंगारें निकलते हैं,
जहां भी जीवन धधक रहा, वह
छांव की खोज में तड़पता है।
हरियाली की चिता पर आज
हमने भट्टियां बना कर रक्खा है!
क्या ठंडे पानी, हवा व छांव के
अभाव का अब भी आभास न होता है?
नयन
१४ जून, २०१९, शुक्रवार
पटना हावड़ा जन शताब्दी
(भीषण गर्मी में)
(चित्र यहां से अभार सहित गृहित है - https://www.google.com/amp/s/www.nytimes.com/2019/06/13/world/asia/india-heat-wave-deaths.amp.html)
Sunday, June 9, 2019
सागर में ढूंढ़ रहे हम
सागर में ढूंढ़ रहे हम
अफसानों के सीपों को,
गोता खाने से कतरा रहे फिर भी
भीग न जाए कहीं तन जो।
हम में तुम में बात अलग है,
इतनी सी से लड़ लें क्या हम?
अंदर बहता जो धुन इकतारा,
अनसुने दिल को कभी सून लो न!
भगदड़ वाला जी है हमारा,
सहे न एक पल का भी थमना।
हर की हरकत, सभी की बातें,
उफान लेे आता है मन में।
सुलगती चिंगारी और धधकती आग में
फासला नहीं ज्यादा कुछ होता,
(जली) राख को ढाखने की (दिखावटी) कोशिश में
भूल जाते हैं - चिंगारी न आने देना ही था आसान।
जीते जी मर मर कर हम
ढूंढते हैं सपनों में जीवन,
हर पल नया, हर सांस नई, पर
न देखने की कसम खाता जन जन।
कैसे निकलें इस अंधी धुन से,
सच की शिखा को थामे कैसे,
जलाएं कैसे मन मंदिर में ज्योति ?
हर पल जो धधकता है डर दिल में।
- नयन
८ जून, २०१९, रविबार
पटना/कोयंबत्तूर
Sunday, May 26, 2019
अनंत अफ़सोसों की माला
अनंत अफ़सोसों की माला
मिट्टी का फूटा घड़ा लिए
मैं पानी भरने जाती हूं,
सोचती हूं कि मेहनत का
साकार हुआ होगा फल,
पर देखती हूं फूटे छेदों से
बह गया है सारा जल!
तकिये में हुए छेदों को मैं
सर के नीचे रख सोती हूं,
छुपाए न छुपे, छेदों से
रुई निकल उड़ जाते हैं,
सर को साफ रखने की कोशिश में
सर मैला हो जाता है।
तुम तो एक ही रहते हो पर,
तुम्हारा रूप बदल बदल जाता है।
सोचती हूं मौसम का खेल होगा
(और) सूरज पर भी शक जाता है,
मुझको धरने वाली धरती से पर,
नज़र दूर खड़ी रहती है।
बदलती छवि के धुओं में मैं
ढूंढती फिरती हूं दुआओं को,
बहती नदी में तैरूं ना पर, मैं
(किनारे) बैठ गिनती हूं सीपों को।
इस पल के मौके को क्यूं दूर
बहने देती हूं समय की नाव में?
मिट्टी को छू लेने की ललक
मन की ही है - मट मेले होने को,
पर खुद को किसी और में
खो देने के डर की झिझक
इतनी है कि, इतना पास आकर भी
बार बार कश्ती को दूर बहने देती हूं।
नयन
१४ अप्रैल, २०१९
कोयंबटूर
Friday, October 25, 2013
Dil Ki Khoj
मेरे पास भी दिल था!
और मुझे कभी
पता ही न था!
पंक्षी की तरह
सोचा था मैंने -
खुद को!
अनवरत बहती नदियों की तरह,
न बँधे लहरों की तरह,
आकंक्षायों और अपेक्षायों -
से आज़ाद!
न जाने कब
मिटा दिया था मैंने -
अपनी भावना को!
और इस दौर में,
खुद ही में पूर्ण -
होने की होड़ में,
जो न हो किसी का
आभाव, न जरुरत!
अकेले चलने की मुझको -
लग गई थी लत!
गर्वित सड़क से गिरा दिया!
पहली बार चाहा मैंने
किसी और को -
खुद से ज्यादा!
पर तब भी कहाँ पता था -
कि ये सब कारनामा
मेरे दिल का ही था!
बहता चला गया था मैं -
नदी के बहाव की तरह,
काग़ज की नाव की तरह!
चलता रहा मैं -
भुत, भविष्य और भाग्य
को भूल, अलमस्त!
तब कहाँ पता था -
कि वह दीपक जल रहा
मदमस्त हो इतना -
कि उसे होना था अस्त!
बहाव में बिखड़े (भू)तल की तरह,
कंपन में गिरते -
अनियमित प्रगति की -
नीव की तरह,
जब टुटा मेरा भी सपना!
दुःख से सहमता, अपना -
वह दिल ही तो था, घायल -
पहन भाग्य और
समाज का पायल!
और पता मुझे आज चला!
जब देखा उसे टूटे टुकड़ों में,
मैं विचलित और विकल!
देखता रहा बहते सपने को,
खंडित उस पात्र से निकल!
रख अपनी परछाई छोड़,
हर हिस्से में प्रति अपनी!
मैं देखूँ किस ओर?
चल दोस्त, अब घर चलें,
समेटना इनको सहज नहीं!
अनजान ही बेहतर था मैं,
दिल के अस्तित्व
के सत्य से!
7:10 am, Wed 5th Sep 2013
Malaysian Township
Hyderabad, India