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Monday, December 23, 2019

Dekhne ki gunzaish nahi hai - देखने की गुंजाइश नहीं है!

ओ मां तेरी बात पुरानी,
लेकिन लागे क्यूं ये नई है?
हर दिन तुझसे सुन सुन कर ही,
अपनी कहानी मैंने खुद बुनी है।

इज्ज़त मिली, चमकते तारीफ़
के अल्फ़ाज़ भी मिले हैं,
पर सुकून को जो वह ढूंढता फिरता,
आज भी दिल में बेसुध चिरैया।

जिम्मेदारियों में नाम कमाया,
हौसलों में बुलंदियों को पाया,
कोशिशों में हमने समय को,
अनछुए को छूने में, कर दिया जाया।

लेकिन दिल में धड़कती
अब भी ख्वाहिश कहीं है,
जो छुपकर रहती,
पर हाय बुझती नहीं है।

दर दर भटक कर चतुराई को पाना,
क्या यही मेरे जिम्मे पड़ा है?
पुरानी सीखों को गंवाया था मैंने,
आज वही मेरे सिरहाने खड़ा है!

न कुछ पाने की चाह है,
न कहीं जाने का कोई राह है।
जो है वह यही है, यहीं है,
न जाने क्यूं बस देखने की 
गुंजाइश नहीं है!


-- नयन
२२ और २३ दिसंबर, २०१९
ईशा योग केंद्र से शुरू कर अरविंद आई अस्पताल में समापन - रात १०:५४ बजे।

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