Nayan | WritersCafe.org

Sunday, September 8, 2019

क्या देख रहा हूं मैं! What am I witnessing! #CauveryCalling

मूसलाधार गिरती है बारिश,
हवाएं तेज हैं बह रहीं,
भीग उसमे चलता जाता
हौसलों से बुलंद एक दल,
और आगे चलता एक इंसान!
क्या देख रहा हूं मैं!

नदी बहे, देश न लड़े,
खुशहाल हो जन - जन,
किसान का जीवन हो आसान।
रुक न सकते, हो रही है देर -
कहते हैं वो, फिर निकल पड़ते!
क्या देख रहा हूं मैं!

एक दिन का प्यार नहीं,
ये बारह साल का संकल्प है!
लगे रहो, मेरे साथ रहो -
लोगों को, सरकारों को
वो याद बार - बार दिलाते हैं !
क्या देख रहा हूं मैं!

गोद में जिसकी खेला था मैं,
बड़ा हुआ जिसकी आंचल में,
तड़प रही वो हम से ही आज!
देखो - देखो वो मर रही!
पुकार रही है कावेरी मैया,
दिल है हममें सुनने को?

ये और विकल्प नहीं,
आन पड़ी जरूरत है अब।
आने वाली पीढ़ियों को
कैसा जीवन देंगे हम -
हल का हिस्सा बनने को वो कहते!
क्या देख रहा हूं मैं!

कावेरी मां को देंगे नई जान
लगाता हूं दाव पे शेष जीवन!
मांगे वो हमारा जीवन कर्म!
बच्चे, बूढ़े और जवान -
जुड़ते जाते उनकी पुकार पे!
क्या देख रहा हूं मैं!

नयन,
८ सितम्बर २०१९
सुबह ६:१०
बेंगलुरु

मैं एक नदी को कैसे बचा सकता हूं ?
बच्चे, बूढ़े और जवान आगे आ रहे हैं...
आप किसका इंतज़ार कर रहे है?

कावेरी को बचाने के लिए साथ आइए
इस लिंक पर स्वयं का अभियान शुरू कीजिए।
cauverycalling.org

Visit cauverycalling.org and support the planting of trees.
Either Donate trees or Become a Fundraiser and reach out to your friends and family for Saving Cauvery river!

Friday, June 14, 2019

sach me tap gayi hai dharti


सच में, तप गई है धरती

सुलगती हवा सीने को चीड़
उठती है ऊपर, आग सा गरम।
झुलसती चेहरे की सुखीं पलकें भी
जैसे बचा न पाती हैं आंखों को।
गिने चुने पेड़ों की मुरझाईं पत्तियां भी
हरियाली से बेआब्रू मिट्टी को
सुकून नहीं दे पाती है, आज
कहीं दिखती नहीं बारिश की आस -
सच में, तप गई है धरती

जो बोल पातें हैं हम, फिर भी
कराहती आहों की आवाज़
नहीं पहुंच पाती है हमारी
सोती अंतरात्मा तक,
बीच में ही कहीं सुख कर
रह जाती है, उन अगनित
नदियों की तरह, जो आज
रेतीली राह बन रह गईं है सिर्फ,
पानी की परछाई से भी दूर।

फिर बेबाक जीवों की कहानी
क्या बयां करें? हम अपनी ही
नहीं सुनते, उनकी क्या सुनेंगे भला?
जीवन तो जीवन है बस, हो
चाहे इंसान, पशु, पक्षी या पेड़,
पर हमारी सिर्फ और पाने की
होड़ ने आज उजाड़ दिया है चमन,
हर एक जान, एक एक बूंद जीवन
के लिए हो गई है मोहताज।

आज अलकतरे की सड़कों से,
गिट्टियों से, सीमेंट-इमारतों से,
ज्वालामुखी के अंगारें निकलते हैं,
जहां भी जीवन धधक रहा, वह
छांव की खोज में तड़पता है।
हरियाली की चिता पर आज
हमने भट्टियां बना कर रक्खा है!
क्या ठंडे पानी, हवा व छांव के
अभाव का अब भी आभास न होता है?

नयन
१४ जून, २०१९, शुक्रवार
पटना हावड़ा जन शताब्दी
(भीषण गर्मी में)

(चित्र यहां से अभार सहित गृहित है - https://www.google.com/amp/s/www.nytimes.com/2019/06/13/world/asia/india-heat-wave-deaths.amp.html)

Sunday, June 9, 2019

सागर में ढूंढ़ रहे हम

सागर में ढूंढ़ रहे हम
अफसानों के सीपों को,
गोता खाने से कतरा रहे फिर भी
भीग न जाए कहीं तन जो।

हम में तुम में बात अलग है,
इतनी सी से लड़ लें क्या हम?
अंदर बहता जो धुन इकतारा,
अनसुने दिल को कभी सून लो न!

भगदड़ वाला जी है हमारा,
सहे न एक पल का भी थमना।
हर की हरकत, सभी की बातें,
उफान लेे आता है मन में।

सुलगती चिंगारी और धधकती आग में
फासला नहीं ज्यादा कुछ होता,
(जली) राख को ढाखने की (दिखावटी) कोशिश में
भूल जाते हैं - चिंगारी न आने देना ही था आसान।

जीते जी मर मर कर हम
ढूंढते हैं सपनों में जीवन,
हर पल नया, हर सांस नई, पर
न देखने की कसम खाता जन जन।

कैसे निकलें इस अंधी धुन से,
सच की शिखा को थामे कैसे,
जलाएं कैसे मन मंदिर में ज्योति ?
हर पल जो धधकता है डर दिल में।

- नयन
८ जून, २०१९, रविबार
पटना/कोयंबत्तूर

পিছু না নিয়ে আর পারলাম না

জানি যে কষ্ট হবে, না পেরে ওঠার
শঙ্কাও ছিল মনে, কিন্তু কী করি -
বাঁসিওয়ালা এমন ধুন বাজালে যে,
পিছু না নিয়ে যে আর পারলাম না !

তোমার চোখের নিরব নৈঃশব্দ,
তোমার হৃদয়ের উচ্ছ্বাসের সাথে
মিশে এক হয়ে আছে, এখানকার
তোমার প্রতিটি পায়ের ছাপে!

বিভীষিকায় বাঁধা মানুষ প্রাণে
লাগে যেই তোমার কৃপার ছোঁয়া,
হালকা হাওয়ায় যায় খুলে জট,
মিলিয়ে মনের ভারী ধোঁয়া।

তাই নিই পিছু তোমারই আজ,
হাসি ফোটাতে মুখে মুখে,
ডাকে - তুমি শুরু করেছ যে কাজ,
পারিনা পারিনা নিজেকে থামাতে।

তাই তোমাকেই দেখি যেন
প্রতিটি শ্বাসে, প্রতি পলে,
যে পথ দেখালে তুমি হাত ধরে,
ভরসা তুমিই, তুমিই সম্বল।

তাই মানুষের মাঝে হই যেন তুমিই,
হারিয়ে নিজেকে তোমার মাঝে,
জাদুকর তাই তোমার তানে আজ
মাতিয়ে তোলো অন্তহীন সাজে!

- নয়ন
৯ জুন, ২০১৯, রবিবার
পাটনা/কোয়েম্বাটোর

Sunday, May 26, 2019

अनंत अफ़सोसों की माला


अनंत अफ़सोसों की माला

मिट्टी का फूटा घड़ा लिए
मैं पानी भरने जाती हूं,
सोचती हूं कि मेहनत का
साकार हुआ होगा फल,
पर देखती हूं फूटे छेदों से
बह गया है सारा जल!

तकिये में हुए छेदों को मैं
सर के नीचे रख सोती हूं,
छुपाए न छुपे, छेदों से
रुई निकल उड़ जाते हैं,
सर को साफ रखने की कोशिश में
सर मैला हो जाता है।

तुम तो एक ही रहते हो पर,
तुम्हारा रूप बदल बदल जाता है।
सोचती हूं मौसम का खेल होगा
(और) सूरज पर भी शक जाता है,
मुझको धरने वाली धरती से पर,
नज़र दूर खड़ी रहती है।

बदलती छवि के धुओं में मैं
ढूंढती फिरती हूं दुआओं को,
बहती नदी में तैरूं ना पर, मैं
(किनारे) बैठ  गिनती हूं सीपों को।
इस पल के मौके को क्यूं दूर
बहने देती हूं समय की नाव में?

मिट्टी को छू लेने की ललक
मन की ही है - मट मेले होने को,
पर खुद को किसी और में
खो देने के डर की झिझक
इतनी है कि, इतना पास आकर भी
बार बार कश्ती को दूर बहने देती हूं।

नयन
१४ अप्रैल, २०१९
कोयंबटूर

Tuesday, April 16, 2019

বিলিয়ে দিলেন সব তিনি

বিলিয়ে দিলেন সব তিনি
এক পলকের নিমিষে,
যা ছিল সবকিছু তার
শুধু একটি শ্বাসে ।

যা সব অজানা, হবে
জানা এক নাগালে,
সাগরে শান্ত জাহাজ,
স্তব্ধ হাওয়ার পালে।

পথিক যে চুপি চুপি আসে -
বারে বারে গেলেন বলে,
শান্ত শুধু হতে হবে তোকে,
সে যে দেখা দিয়ে চলে ।

এই হল সেই আসল মানিক,
ছেড়ে তুই খুঁজিস কারে ?
যাবে যে নিয়ে সঙ্গ ডোরে
জনম মরণের পারে ।

চক্ষু দুটির পারে চাওয়া,
মনের অন্তরে যাওয়া,
নিজেকে হারিয়ে তবেই
নিজেকে খুঁজে পাওয়া।

-- নয়ন
মার্চ - এপ্রিল, ২০১৯

Wednesday, September 19, 2018

কোথায়ে আমার মুক্তি প্রভু

কোথায়ে আমার মুক্তি প্রভু?
মুক্তি, কোথায়ে খুঁজি তোমাকে?
সৃষ্টির বিস্ময়ে, বাহির প্রান্তরে,
না, নিশ্চিহ্ন তার শূন্যে, মনের অন্তরে?

দিয়ে ফাঁকি কর্তব্যের ফাঁকে,
না, দায়িত্বের চাপে কর্তব্যের ফাঁদে?
হে মুক্তি, কোথায়ে আছো আড়াল,
কোথায়ে পাবো তোমাকে?

করণীয় কিন্তু পিছিয়ে থাকা অপূর্ণতা
যবে করে গ্লানির অধীন, তবে
আবশ্যকতা অনুযায়ী কর্মের প্রচেষ্টা
কি মুক্তির পথ খুলে দেয় না?

উপকৃত জীবের তৃপ্ত হাঁসি
যখন দু চোখ ভাসিয়ে দেয়,
তখন কি আর থাকে স্বার্থের লেশ?
আপন পরের গণ্ডি ছাড়ায়ে অনায়াস।

অলঙ্কারের অহঙ্কার - শব্দে ও রূপে,
বহিয়ে নিয়ে যায় দূরে,
নির্মল, নিরঞ্জন মন মম,
বাঁধ ভাঙ্গা বন্যা সম!

কিন্তু অচেতনতার সাগর ও
এত চেতনা বিহীন নয়!
বারন বার্তার ফুলকি যেন
ক্ষণে ক্ষণে তীরের আভাস দেয়।

জগতে যে দিতে হবে জ্যোতি,
সত্য বিনা কেমনে পাবো স্থির গতি?
কেমনে থামবে এই সমাজ স্খলন,
বিনা লৌহ সিংহ জ্বলন্ত অগণন?

জনমের শোধ ডাকে যে বারে বারে
(ভৌতিক) সংসারের অনন্ত কূপে!
কেমনে হবে মানস শুদ্ধি?
কাঁদে (নিরুপায়) বিবেকহীন বুদ্ধি!

চাবিহীন হাথে কেন খুঁজে ফিরি
অদৃশ্য দরজার অস্তিত্বহীন তালা?
এপার ও ওপারে যখন নেই কোন দেয়াল,
অাপনারে বেঁধে রাখে কেন এ তীরের খেয়াল?

হে সম্রাট!
দাও দাও ধ্বনি! কর কলরব শূন্য!
কর্ম যুক্ত, ভক্তি সিক্ত করে
মোরে চৈতন্যে দিয়ে গড়ে,
কর স্নিগ্ধ দীপ্তি পূর্ণ!

প্রাণ দিয়ে করা কাজের
না হোক কোন গণ্ডি ও ভেদ!
যেন কাজের মাঝেই ধ্যান
ও পাই ভক্তির সমাবেশ!

কর শক্ত, কর সত্য,
দুর্বলতা - দ্বিধা বিহীন চিত্তে,
সেবা - ই হউক মুক্তি আমার,
করি অর্পণ এই মানব তীর্থে!

-- নয়ন
9:20pm, 19th Sep'2018, Patna

(C) Bhaskar Jyoti Ghosh