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सर कटा मुसाफिर" (Sir Kata Musafir or the Headless Traveller represents a man who has given up his attachments to bias through his perception, sight, hearing, emotion, and thoughts. He, thus, walks without a source (transmitter) and target (receiver) of all bias, of all evil, of all pain - his head.
I have used the famous headless statue of
King Kanishka.
While it may not be appropriate to put Kanishka's image as the headless
traveller, given that he wielded one of the greatest and largest empire
extending from India well up to Iran and China; at the same time, it may also be
appropriate given that the head of the statue was missing when it was discovered, making the man depicted in the statue look like a
warrior-traveller, who represented an unbiased dutiful attitude with
his headless appearance!)
सर कटा मुसाफिर
गुमनाम रातों की गलियों
में
घूमता है वह
-
सर कटा मुसाफिर!
अंधेरे के साये
में
जब रौशनी गायब
सी लगती है
-
शैतान के क़दमों
की आहट
गिनता है वह
-
सर कटा मुसाफिर!
उमंगों की चीखें
और गलतियों की
आहें -
कभी बहा के
ले जातीं हैं,
खुशनुमां कश्ती को किनारे
से दूर!
शुक्र है, सुन
नहीं पाता है
वह -
सर कटा मुसाफिर!
ज़माने का दस्तूर,
और इंसानियत का मुखौटा
-
रौशनी में चमकता
तो खूब!
जब दिन का
सूरज उसे
भेद नहीं पाता!
और आँखें देख
नहीं पातीं कभी
-
नंगी रातों में
बेखौफ-बेनकाब उसका
रंग!
शुक्र है, बेनजर
है वह -
सर कटा मुसाफिर!
लोग अनजान ही अच्छे
थे!
लोग अनजान ही
अच्छे हैं!
नजदीकी दागों को सामने
ले आती हैं,
दिल का नाम
लेकर सुकून पी
जाती हैं!
इसलिए बेख़बर, सोया,
चलता है वह
-
सर कटा मुसाफिर!
लोग मजाक़ करते
तो हैं,
पर कभी दर्द
भी देते हैं!
मजाक़ पर हँसते
हैं कभी,
और कभी दर्द
भी लेते हैं!
इसलिए इनसे हट,
अलग -
राह पर चलता
है वह -
सर कटा मुसाफिर!
खामोश से समां
में -
तूफान की उम्मीद
न होती,
मासूम से कटोरे
में -
'गर वह उफान
न दिखती!
पानी से दूर,
सूखे राहों पर
चलता है वह
-
सर कटा मुसाफिर!
कश्ती को बांधती
है ज़ंजीरें ज़रूर
-
पर दम भी
घूंट जाता है
उनसे!
मोतियाँ बिखर जातीं
हैं, धागे के
बिन -
पर पिंजरे के
बाहर ही उड़ती
है चिड़ी
अपनी असली उड़ान!
अज़ाद से सपने,
औ' गुलाम से
दिल, से दूर
है वह -
सर कटा मुसाफिर!
लोग दिमाग लगाते हैं
खूब,
गलतियों पर अपनी
उँगलियाँ भी नचाते
हैं खूब!
फिर भी, छोटीं
मुसीबतों के चौखट
पर
बहुत से नगमें
ठोकर खा जाते
हैं!
दिल दिमाग का
ही रंग है
-
इसलिए तो बिन
सर, फिरता है
वह -
सर कटा मुसाफिर!
नयन
10 am, 26th Jan 2011
Madhapur
Hyderabad, India
[Image source: http://www.exoticindiaart.com/artimages/BuddhaImage/kanishka_sm.jpg]